|
इक उम्र हो गई है, इन्सान मर गया है !
चाहे झटका हो अर्थात् खंजर के एक ही वार से पशु की
गर्दन कटे,
या हलाल हो, आरी से धीरे - धीरे पशु की गर्दन कटे,
बात एक ही है।
कसाई की छुरी चलती है, खून का फव्वारा छूटता है,
जानवर तड़फता है, उछलता है, चीखता है, चिल्लाता है,
और बुरी तरह छटपटाता है।
पर कसाई ! पशु का दम लेकर ही दम लेता है।
|